राजस्थान के लोक नृत्य
राजस्थान के लोक नृत्य यहां के रंग-बिरंगे जनजीवन की सजीव अभिव्यक्ति हैं। घूमर को लोक नृत्यों की आत्मा कहा जाता है, जबकि कालबेलिया नृत्य UNESCO की सूची में शामिल है। क्षेत्र, जाति और अवसर के अनुसार यहां अनेक प्रकार के नृत्य प्रचलित हैं।
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राजस्थान के लोक नृत्य
राजस्थानी लोक नृत्यों को चार वर्गों में बांटा जाता है — क्षेत्रीय नृत्य (गैर, गींदड़, चंग), सामाजिक-धार्मिक नृत्य (घूमर, तेरहताली), व्यावसायिक नृत्य (भवाई, कच्छी घोड़ी) और जनजातीय नृत्य (गवरी, वालर, चकरी)।
घूमर नृत्य
लोक नृत्यों की आत्मा · रजवाड़ी नृत्य · नृत्यों का सिरमौर
- केवल महिलाओं द्वारा गणगौर, तीज और मांगलिक अवसरों पर किया जाता है।
- घेरदार घाघरे के घूमने से इसका नाम घूमर पड़ा; नृत्य में आठ मात्रा के कहरवा ताल का प्रयोग होता है और विशेष चाल "सवाई" कहलाती है।
- बालिकाओं द्वारा किया जाने वाला घूमर "झूमरिया" कहलाता है।
- भील स्त्रियों का घूमर से मिलता-जुलता नृत्य "घूमरा" है।
कालबेलिया नृत्य
यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (2010)
- कालबेलिया (सपेरा) जाति की महिलाएं काले घाघरे में सांप की तरह लचीली मुद्राओं में यह नृत्य करती हैं; पुरुष पूंगी (बीन) व खंजरी बजाते हैं।
- 2010 में यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया।
- प्रसिद्ध नृत्यांगना गुलाबो सपेरा (पद्मश्री 2016)।
- कालबेलियों के अन्य नृत्य — इंडोणी (स्त्री-पुरुष, गोलाकार), शंकरिया (प्रेम कहानी पर युगल नृत्य), पणिहारी (युगल), बागड़िया (भीख मांगते समय)।
भवाई नृत्य
व्यावसायिक नृत्य · संतुलन और चमत्कार का नृत्य
- मेवाड़ क्षेत्र की भवाई जाति का व्यावसायिक नृत्य; प्रवर्तक बाघाजी माने जाते हैं।
- नर्तक सिर पर 7-8 मटके रखकर, थाली के किनारों, नंगी तलवार की धार या कांच के टुकड़ों पर नृत्य करते हैं। ज़मीन से मुंह से रूमाल उठाना भी इसका भाग है।
- प्रसिद्ध कलाकार — रूपसिंह शेखावत, दयाराम, तारा शर्मा, अस्मिता काला, पुष्पा व्यास।
- भवाई नृत्य में "बीकाजी" व "बाघाजी" जैसे पात्रों की प्रस्तुति होती है।
क्षेत्रीय लोक नृत्य
🪃 गैर नृत्य
मेवाड़ व मारवाड़ में होली पर पुरुषों द्वारा गोल घेरे में हाथ में डंडे लेकर। नर्तक "गैरिये" कहलाते हैं। बाड़मेर-बालोतरा का कनाणा प्रसिद्ध; पुरुष सफेद अंगरखी पहनते हैं।
🥁 गींदड़ नृत्य
शेखावाटी में होली पर पुरुषों द्वारा (डंडा रोपण से होली तक)। नगाड़े की थाप पर; कुछ पुरुष स्त्री वेश में "गणगौर" बनते हैं।
🪘 चंग नृत्य
शेखावाटी में होली पर पुरुषों द्वारा; हर पुरुष के हाथ में चंग (ढफ); धमाल गाई जाती है।
🐎 कच्छी घोड़ी
शेखावाटी का व्यावसायिक नृत्य; पुरुष बांस की बनी नकली घोड़ी कमर पर बांधकर तलवारबाज़ी करते हैं। नृत्य में "पैटर्न बनाने" की कला; सरगड़ा, ढोली व बावरी जातियां प्रसिद्ध।
🔥 अग्नि नृत्य
जसनाथी संप्रदाय के सिद्ध पुरुष कतरियासर (बीकानेर) में धधकते अंगारों (धूणा) पर "फतै-फतै" का उद्घोष करते हुए नृत्य करते हैं। बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने इसे संरक्षण दिया।
🥁 ढोल नृत्य
जालोर का पुरुष नृत्य, विवाह पर; सरगरा जाति ढोल बजाती है। थाकना शैली में; पूर्व मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास ने इसे प्रकाश में लाया।
⚡ बम नृत्य
भरतपुर-अलवर (मेवात) में फाल्गुन पर नई फसल की खुशी में पुरुषों द्वारा; बड़े नगाड़े "बम" को डंडों से बजाते हैं; "रसिया" गाए जाते हैं।
🪔 चरी नृत्य
किशनगढ़ (अजमेर) की गुर्जर महिलाएं सिर पर पीतल की चरी (कलश) में जलते कपास के बीज रखकर नृत्य करती हैं। प्रसिद्ध नृत्यांगना फलकू बाई।
🎊 चकरी नृत्य
हाड़ौती (कोटा-बारां-बूंदी) की कंजर जाति की बालाएं तेज़ी से चक्कर लगाते हुए; ढप व मंजीरे के साथ। कंजरों का अन्य नृत्य — धाकड़ (पुरुष, युद्ध का प्रदर्शन)।
⚔️ तलवारों की गैर
मेनार (उदयपुर) में होली के बाद जमराबीज पर पुरुष तलवारें लेकर गैर नृत्य करते हैं।
🛕 तेरहताली
कामड़ जाति की महिलाएं रामदेवजी के मेले में शरीर पर 13 मंजीरे बांधकर बैठकर नृत्य करती हैं। प्रसिद्ध नृत्यांगना मांगी बाई (पादरला, पाली)।
🌺 डांडिया
मारवाड़ में होली के बाद पुरुषों द्वारा डंडों के साथ गोलाकार नृत्य; बड़ली के भैरूजी के गीत गाए जाते हैं।
जनजातीय लोक नृत्य
| जनजाति | प्रमुख नृत्य | विशेषता |
|---|---|---|
| भील | गवरी (राई) | पुरुषों द्वारा भाद्रपद में लगभग 40 दिन; शिव-भस्मासुर की कथा; "लोक नाट्यों का मेरुनाट्य" |
| भील | गैर, घूमरा, नेजा, युद्ध नृत्य, द्विचक्री, हाथीमना | नेजा — होली के बाद खंभे पर नारियल; हाथीमना — विवाह पर पुरुष |
| गरासिया | वालर | स्त्री-पुरुष दो अर्धवृत्तों में, बिना वाद्य के; सिरोही क्षेत्र |
| गरासिया | लूर, कूद, मांदल, गौर, जवारा, मोरिया | लूर — गरासिया महिलाएं; मोरिया — विवाह पर पुरुष |
| सहरिया | शिकारी नृत्य, लहंगी | बारां जिला; शिकार का अभिनय |
| कथौड़ी | मावलिया, होली नृत्य | उदयपुर क्षेत्र |
| कंजर | चकरी, धाकड़ | हाड़ौती |
| मेव | रणबाजा, रतवई | अलवर-मेवात क्षेत्र |
⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) घूमर — “लोक नृत्यों की आत्मा”। (2) कालबेलिया — UNESCO सूची (2010); गुलाबो सपेरा — पद्मश्री। (3) अग्नि नृत्य — जसनाथी सिद्ध, कतरियासर (बीकानेर)।
वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)
- कालबेलिया नृत्य UNESCO सूची में — 2010; गुलाबो सपेरा — पद्मश्री 2016।
- अग्नि नृत्य — जसनाथी सिद्ध, कतरियासर (बीकानेर)।
- भवाई नृत्य के प्रवर्तक — बाघाजी।
- तेरहताली — कामड़ जाति, रामदेवजी के मेले में।
- चरी नृत्य — किशनगढ़ की गुर्जर महिलाएं; फलकू बाई।
- चकरी नृत्य — कंजर जाति (हाड़ौती)।
- वालर नृत्य — गरासिया, बिना वाद्य के।
- गींदड़ व चंग — शेखावाटी, होली पर; गैर — मेवाड़-मारवाड़ (कनाणा प्रसिद्ध)।
- ढोल नृत्य — जालोर, थाकना शैली।
- बम नृत्य — भरतपुर-अलवर, फाल्गुन में।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
विकल्प चुनें — सही उत्तर तुरंत दिखेगा।
1 कालबेलिया नृत्य को UNESCO सूची में कब शामिल किया गया?
2 अग्नि नृत्य किस संप्रदाय से संबंधित है?
3 भवाई नृत्य के प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?
4 तेरहताली नृत्य किस जाति द्वारा किया जाता है?
5 चरी नृत्य किस क्षेत्र की गुर्जर महिलाओं का नृत्य है?
6 चकरी नृत्य किस जाति से संबंधित है?
7 वालर नृत्य किस जनजाति का है?
8 गींदड़ नृत्य किस क्षेत्र का प्रसिद्ध है?
9 ढोल नृत्य किस जिले का प्रसिद्ध है?
10 बम नृत्य किस क्षेत्र में किया जाता है?