राजस्थान की चित्रकला

वापस

राजस्थानी चित्रकला भारतीय चित्रकला की एक समृद्ध परंपरा है, जिसे "राजपूत चित्रकला" भी कहा जाता है। विभिन्न रियासतों के राजाश्रय में अलग-अलग शैलियां (कलमें) विकसित हुईं। इनमें भक्ति, श्रृंगार, प्रकृति, शिकार और दरबारी जीवन का सुंदर चित्रण मिलता है।

🏞️
4 स्कूल
मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़, हाड़ौती
👸
बणी-ठणी
भारत की मोनालिसा
🎨
मेवाड़
राजस्थानी चित्रकला की जनक शैली
📜
1260 ई.
श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि
📑 विषय सूची 12 टॉपिक

परिचय एवं वर्गीकरण

मेवाड़ स्कूलउदयपुर, चावंड, नाथद्वारा, देवगढ़
मारवाड़ स्कूलजोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, नागौर, जैसलमेर
ढूंढाड़ स्कूलआमेर, जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी
हाड़ौती स्कूलबूंदी, कोटा, झालावाड़

मेवाड़ स्कूल

🏞️

उदयपुर (मेवाड़) शैली

राजस्थानी चित्रकला की जनक शैली

अति महत्वपूर्ण
स्वर्णकालमहाराणा जगतसिंह प्रथम
प्रमुख रंगपीला व लाल
वृक्षकदंब
नेत्रमीनाकृत (मछली जैसे)
पशु-पक्षीहाथी, चकोर
चित्रकारसाहिबदीन, मनोहर, कृपाराम
  • महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628-52) के समय मेवाड़ चित्रकला का स्वर्णकाल था; उन्होंने राजमहल में चित्रकारों का कारखाना "चितेरों की ओवरी" (तस्वीरां रो कारखानो) स्थापित किया।
  • साहिबदीन ने रामायण, भागवत पुराण व रागमाला के चित्र बनाए।
  • विषय — कृष्ण लीला, रामायण, महाभारत, गीत गोविंद, रसिकप्रिया, नायिका भेद, दरबार व शिकार।

⚔️ चावंड शैली

महाराणा प्रताप के समय चावंड राजधानी बनी और यह शैली विकसित हुई। महाराणा अमरसिंह प्रथम के समय 1605 ई. में चित्रकार निसारदीन ने "रागमाला" चित्रित की।

🐄 नाथद्वारा शैली

श्रीनाथजी (वल्लभ संप्रदाय) से संबंधित; मेवाड़ व ब्रज शैली का मिश्रण। कपड़े पर श्रीनाथजी के पीछे लगने वाले चित्र "पिछवाई" प्रसिद्ध। गाय, केले के वृक्ष, हरा-पीला रंग।

🏰 देवगढ़ शैली

देवगढ़ (राजसमंद) ठिकाने में विकसित; मेवाड़, मारवाड़ व ढूंढाड़ शैलियों का समन्वय। श्रीधर अंधारे ने इसे प्रकाश में लाया। चित्रकार — चोखा, बैजनाथ, कंवला।

मारवाड़ स्कूल

👸

किशनगढ़ शैली

बणी-ठणी · भारत की मोनालिसा

अति महत्वपूर्ण
स्वर्णकालसावंतसिंह (नागरीदास)
प्रमुख चित्रकारनिहालचंद
प्रमुख रंगसफेद व गुलाबी
वृक्षकेला
नेत्रखंजन (कमान जैसी भौंहें)
विशेषतानौका विहार, झील
  • सावंतसिंह (कवि नाम नागरीदास) की प्रेमिका व गायिका बणी-ठणी का चित्र निहालचंद ने बनाया।
  • एरिक डिकिन्सन ने बणी-ठणी को "भारत की मोनालिसा" कहा। इस पर 5 मई 1973 को भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया।
  • किशनगढ़ शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिकिन्सन व डॉ. फैयाज अली को है।
  • लंबी गर्दन, नुकीली नासिका, पतले होंठ और खंजन नेत्र — इस शैली में नारी सौंदर्य की विशेष पहचान।

🐎 जोधपुर शैली

स्वर्णकाल — महाराजा मानसिंह। रंग — पीला; वृक्ष — आम; नेत्र — बादाम जैसे; पशु — घोड़ा, ऊंट। मानसिंह के समय नाथ संप्रदाय के चित्र बने। ढोला-मारू, मूमल-महेन्द्र जैसी प्रेमकथाएं प्रिय विषय।

🐫 बीकानेर शैली

स्वर्णकाल — महाराजा अनूपसिंह। मुगल प्रभाव सर्वाधिक; चित्रकार "उस्ता" कहलाते थे (अली रज़ा, रुकनुद्दीन)। चित्रकार चित्र पर अपना नाम व तिथि लिखते थे। ऊंट की खाल पर स्वर्ण चित्रण "उस्ता कला" — हिसामुद्दीन उस्ता (पद्मश्री)।

🏜️ जैसलमेर शैली

मुगल प्रभाव से मुक्त स्थानीय शैली; मूमल इस शैली का प्रसिद्ध चित्र। राजाश्रय — महारावल हरराज, अखैसिंह।

🪟 नागौर शैली

पारदर्शी वेशभूषा का अंकन; बुझे हुए (हल्के) रंगों का प्रयोग। नागौर दुर्ग के भित्ति चित्र प्रसिद्ध।

ढूंढाड़ स्कूल

👑 जयपुर शैली

स्वर्णकाल — सवाई प्रतापसिंह। चित्रकारों का विभाग "सूरतखाना" कहलाता था। रंग — हरा; वृक्ष — पीपल, वट; आदमकद व्यक्ति चित्र (पोर्ट्रेट) और भित्ति चित्र (आलागीला/आराइश) प्रसिद्ध। चित्रकार — साहिबराम, लालचंद।

🐘 अलवर शैली

स्वर्णकाल — महाराजा विनयसिंह; जयपुर व मुगल शैली का समन्वय। वेश्याओं के चित्र, योगासन के चित्र, हाथी दांत पर चित्रकारी (मूलचंद) प्रसिद्ध। चित्रकार — बलदेव, सालिगराम, नानकराम, डालचंद।

🏰 आमेर शैली

ढूंढाड़ की प्राचीनतम शैली; मानसिंह प्रथम के समय विकसित। आमेर महल व मौजमाबाद (जयपुर) के भित्ति चित्र प्रमुख उदाहरण।

🎯 उणियारा शैली

टोंक जिले के उणियारा ठिकाने में; जयपुर व बूंदी शैली का मिश्रण। चित्रकार — धीमा, मीरबक्श, काशी।

🖼️ शेखावाटी शैली

हवेलियों के भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध; लोक जीवन व अंग्रेज़ी प्रभाव (रेल, मोटर, साहब) के चित्र। "ओपन एयर आर्ट गैलरी"।

हाड़ौती स्कूल

🦚 बूंदी शैली

स्वर्णकाल — राव उम्मेदसिंह, जिन्होंने "चित्रशाला" बनवाई (भित्ति चित्रों का खज़ाना)। रंग — हरा; वृक्ष — खजूर; पशु-पक्षी — मोर, हिरण, शेर। प्रकृति, वर्षा ऋतु व पशु-पक्षियों का सर्वाधिक चित्रण।

🐅 कोटा शैली

स्वर्णकाल — महाराव उम्मेदसिंह। शिकार के दृश्यों के लिए प्रसिद्ध — रानियों को भी शिकार करते दिखाया गया। वृक्ष — खजूर। चित्रकार — डालू (1768 की रागमाला), लच्छीराम।

🏞️ झालावाड़ शैली

झालावाड़ के राजमहलों के भित्ति चित्र; श्रीनाथजी व कृष्ण लीला के चित्र।

शैलियों की तुलना

शैलीस्वर्णकाल (शासक)प्रमुख रंगवृक्षविशेष पहचान
मेवाड़जगतसिंह प्रथमपीला, लालकदंबमीन नेत्र, हाथी
जोधपुरमानसिंहपीलाआमबादाम नेत्र, घोड़ा
बीकानेरअनूपसिंहपीला—उस्ता चित्रकार, मुगल प्रभाव
किशनगढ़सावंतसिंहसफेद, गुलाबीकेलाबणी-ठणी, खंजन नेत्र
जयपुरसवाई प्रतापसिंहहरापीपल, वटआदमकद चित्र, सूरतखाना
अलवरविनयसिंह——वेश्या चित्र, हाथी दांत
बूंदीउम्मेदसिंहहराखजूरचित्रशाला, मोर
कोटाउम्मेदसिंह—खजूरशिकार दृश्य
नाथद्वारा—हरा, पीलाकेलापिछवाई, गाय

लोक चित्रकला

📜 फड़

रेज़ी (खादी) कपड़े पर लोक देवताओं के जीवन का चित्रण; शाहपुरा (भीलवाड़ा) का जोशी परिवार प्रसिद्ध। श्रीलाल जोशी (पद्मश्री)। पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय, देवनारायण की सबसे लंबी।

🪟 कावड़

लकड़ी का मंदिरनुमा चल देवघर, जिसके कई कपाट खुलते जाते हैं और कथावाचक (कावड़िया भाट) कथा सुनाता है। बस्सी (चित्तौड़गढ़) के खैरादी परिवार बनाते हैं।

🖼️ पिछवाई

नाथद्वारा में श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे लगाए जाने वाले कपड़े पर बने बड़े चित्र; कृष्ण लीला के दृश्य।

🔶 मांडणा

त्योहारों व मांगलिक अवसरों पर घर के आंगन व दीवारों पर खड़िया व गेरू से बनाई जाने वाली ज्यामितीय आकृतियां — "शुभ-अशुभ की प्रतीक"।

🍂 सांझी

श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) में कुंवारी कन्याएं दीवार पर गोबर से सांझी बनाती हैं। नाथद्वारा का "केले के पत्तों की सांझी" प्रसिद्ध; उदयपुर में "सांझी का मंदिर" (मछंदरनाथ)।

🧱 पाने

कागज़ पर बने देवी-देवताओं के चित्र, जिन्हें त्योहारों पर पूजा जाता है; श्रीनाथजी का पाना सबसे कलात्मक।

🎨 थापा / गोदना

गोदना — शरीर पर स्थायी चित्र (टैटू), जनजातियों में लोकप्रिय। मेहंदी को राजस्थान में सुहाग का प्रतीक माना जाता है; सोजत (पाली) की मेहंदी प्रसिद्ध।

आधुनिक चित्रकार

चित्रकारप्रसिद्धि
रामगोपाल विजयवर्गीयसवाई माधोपुर; एकल चित्र प्रदर्शनी करने वाले राजस्थान के प्रथम चित्रकार; पद्मश्री
भूरसिंह शेखावतबीकानेर; स्वतंत्रता सेनानियों व ग्रामीण जीवन के चित्र
परमानंद चोयलकोटा; "भैंसों के चितेरे"
देवकीनंदन शर्माअलवर; "मास्टर ऑफ नेचर एंड लिविंग ऑब्जेक्ट्स"
कृपालसिंह शेखावतसीकर; ब्लू पॉटरी के पुनरुद्धारक; पद्मश्री
गोवर्धनलाल जोशी (बाबा)कांकरोली; भीलों के चितेरे
ज्योति स्वरूपजोधपुर; "इनर जंगल" चित्र श्रृंखला
सौभाग्यमल गहलोतजयपुर; "नीड़ का चितेरा"
💡 संस्थान: राजस्थान ललित कला अकादमी — जयपुर (1957); राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स — जयपुर (महाराजा रामसिंह द्वितीय के समय "मदरसा-ए-हुनरी", 1857); "तूलिका कलाकार परिषद" — उदयपुर।

⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) राजस्थानी चित्रकला की चार प्रमुख शैलियां (स्कूल) — मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती, ढूंढाड़। (2) बणी-ठणी — किशनगढ़ शैली, चित्रकार निहालचंद; “भारत की मोनालिसा” — एरिक डिकिन्सन ने कहा। (3) सबसे प्राचीन शैली — मेवाड़; प्रथम चित्रित ग्रंथ — श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260)।

वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)

  1. राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक वर्गीकरण — आनंद कुमार स्वामी (1916)।
  2. सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ — श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260, आहड़)।
  3. राजस्थानी चित्रकला की जनक शैली — मेवाड़ शैली।
  4. चावंड की रागमाला (1605) — निसारदीन।
  5. "भारत की मोनालिसा" — बणी-ठणी (निहालचंद, किशनगढ़); डाक टिकट 5 मई 1973।
  6. बीकानेर के चित्रकार कहलाते थे — उस्ता।
  7. जयपुर के चित्रकारों का विभाग — सूरतखाना; मेवाड़ का — चितेरों की ओवरी।
  8. बूंदी की चित्रशाला — राव उम्मेदसिंह।
  9. शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध — कोटा शैली।
  10. कावड़ बनाने का केंद्र — बस्सी (चित्तौड़गढ़)।
  11. "भैंसों के चितेरे" — परमानंद चोयल।
  12. पिछवाई — नाथद्वारा।
  13. पिछवाई चित्रकला — नाथद्वारा।
  14. फड़ चित्रकला — शाहपुरा (भीलवाड़ा), जोशी परिवार।
  15. शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध — कोटा शैली।
  16. बूंदी की चित्रशाला — राव उम्मेदसिंह।

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

विकल्प चुनें — सही उत्तर तुरंत दिखेगा।

1 "बणी-ठणी" चित्र किस शैली से संबंधित है?

2 बणी-ठणी का चित्रकार कौन था?

3 चावंड शैली में रागमाला (1605) किसने चित्रित की?

4 बीकानेर शैली के चित्रकार किस नाम से जाने जाते थे?

5 किस शैली में शिकार के दृश्यों की प्रधानता है?

6 मेवाड़ शैली का प्रमुख वृक्ष कौनसा है?

7 "सूरतखाना" किस रियासत से संबंधित है?

8 कावड़ कला का प्रमुख केंद्र कौनसा है?

9 बूंदी की चित्रशाला का निर्माण किसने करवाया?

10 "भैंसों के चितेरे" किस चित्रकार को कहा जाता है?

स्कोर: 0 / 10
वापस