गुर्जर-प्रतिहार वंश
7वीं से 11वीं सदी के बीच उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहार सबसे शक्तिशाली राजवंश थे। इन्होंने लगभग तीन सदियों तक अरब आक्रमणों को रोके रखा और कन्नौज के लिए पाल व राष्ट्रकूटों से त्रिपक्षीय संघर्ष लड़ा। राजस्थान में इनकी प्रारंभिक शाखाएं मंडोर और भीनमाल में थीं।
📑 विषय सूची 7 टॉपिक
उत्पत्ति
- प्रतिहार स्वयं को लक्ष्मण का वंशज मानते थे — लक्ष्मण श्रीराम के प्रतिहार (द्वारपाल) थे; इसका उल्लेख घटियाला व बाउक के शिलालेखों में है।
- "गुर्जर" शब्द को कुछ विद्वान गुर्जरात्रा प्रदेश (क्षेत्र) से जोड़ते हैं, तो कुछ एक जाति से।
- चंदबरदाई ने प्रतिहारों को भी अग्निकुंड से उत्पन्न चार वंशों में गिना है।
- राजस्थान में प्रतिहारों की कई शाखाएं थीं — मंडोर, भीनमाल (जालोर), राजोगढ़ आदि।
मंडोर शाखा
- संस्थापक हरिश्चंद्र (रोहिल्लद्धि) — एक ब्राह्मण, जिनकी क्षत्रिय पत्नी भद्रा से उत्पन्न पुत्रों ने मंडोर में राज्य स्थापित किया।
- शासक कक्कुक का घटियाला शिलालेख (861 ई.) प्रसिद्ध है; बाउक का मंडोर शिलालेख (837 ई.)।
- 14वीं सदी के अंत में इंदा प्रतिहारों ने मंडोर राठौड़ राव चूंडा को दहेज में दे दिया (1395)।
भीनमाल-कन्नौज की शाही शाखा
| शासक | काल | प्रमुख उपलब्धियां |
|---|---|---|
| नागभट्ट प्रथम | 730-760 | वंश के वास्तविक संस्थापक; अरब आक्रमणों को रोका — ग्वालियर प्रशस्ति में "नारायण रूप" व "म्लेच्छों का नाशक" कहा गया; राजधानी भीनमाल (बाद में उज्जैन) |
| कक्कुक व देवराज | — | नागभट्ट प्रथम के भतीजे; अल्पकालीन शासन |
| वत्सराज | 783-795 | "रणहस्तिन"; बंगाल के पाल शासक धर्मपाल को हराया, पर राष्ट्रकूट ध्रुव से पराजित — त्रिपक्षीय संघर्ष का आरंभ; ओसियां का महावीर मंदिर; इसी काल में जालोर में उद्योतन सूरि ने "कुवलयमाला" (778) लिखी |
| नागभट्ट द्वितीय | 795-833 | चक्रायुध को हराकर कन्नौज जीता और उसे राजधानी बनाया; मुंगेर में धर्मपाल को हराया; राष्ट्रकूट गोविंद तृतीय से पराजित; गंगा में जल समाधि |
| रामभद्र | 833-836 | अल्पकालीन, कमज़ोर शासन |
| मिहिरभोज प्रथम | 836-885 | प्रतिहारों का सबसे प्रतापी शासक; उपाधियां "आदिवराह" व "प्रभास"; आदिवराह शैली के सिक्के; ग्वालियर प्रशस्ति; अरब यात्री सुलेमान (851) ने उसकी सेना की प्रशंसा की और उसे इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया |
| महेंद्रपाल प्रथम | 885-910 | गुरु राजशेखर — "कर्पूरमंजरी", "काव्यमीमांसा"; साम्राज्य का अधिकतम विस्तार |
| महिपाल प्रथम | 912-944 | अरब यात्री अल मसूदी (915) ने यात्रा की; राष्ट्रकूट इंद्र तृतीय ने कन्नौज लूटा |
| राज्यपाल | — | 1018 में महमूद गज़नवी के आक्रमण के समय कन्नौज छोड़कर भागा |
| यशपाल | — | अंतिम प्रतिहार शासक; इसके बाद गहड़वालों ने कन्नौज पर अधिकार किया |
त्रिपक्षीय संघर्ष
कन्नौज पर अधिकार के लिए 8वीं-10वीं सदी का संघर्ष
प्रतिहारकालीन स्थापत्य
- प्रतिहारों के संरक्षण में विकसित मंदिर शैली — महामारू (गुर्जर-प्रतिहार) शैली।
- प्रमुख उदाहरण — ओसियां के मंदिर (सच्चियाय माता, हरिहर, महावीर), आभानेरी का हर्षत माता मंदिर, बाड़ोली के मंदिर।
- प्रतिहारकालीन सिक्के "द्रम्म" व "विशोपक" कहलाते थे।
⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) “आदिवराह” — मिहिरभोज; अरबों को रोका — नागभट्ट प्रथम। (2) त्रिपक्षीय संघर्ष — प्रतिहार, पाल, राष्ट्रकूट (कन्नौज के लिए)। (3) मंडोर शाखा के संस्थापक — हरिश्चंद्र।
वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)
- प्रतिहार स्वयं को — लक्ष्मण का वंशज मानते थे।
- मंडोर शाखा के संस्थापक — हरिश्चंद्र; घटियाला शिलालेख — कक्कुक (861)।
- अरबों को रोकने वाला — नागभट्ट प्रथम।
- त्रिपक्षीय संघर्ष का आरंभ — वत्सराज; पक्ष — प्रतिहार, पाल, राष्ट्रकूट।
- कन्नौज को राजधानी बनाया — नागभट्ट द्वितीय।
- "आदिवराह" — मिहिरभोज; अरब यात्री — सुलेमान (851)।
- राजशेखर के शिष्य — महेंद्रपाल प्रथम।
- कुवलयमाला (778, जालोर) — उद्योतन सूरि, वत्सराज के काल में।
- प्रतिहारकालीन मंदिर शैली — महामारू।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
विकल्प चुनें — सही उत्तर तुरंत दिखेगा।
1 प्रतिहार स्वयं को किसका वंशज मानते थे?
2 मंडोर की प्रतिहार शाखा के संस्थापक कौन थे?
3 अरब आक्रमणों को रोकने वाला प्रतिहार शासक कौन था?
4 त्रिपक्षीय संघर्ष किसके लिए हुआ?
5 "आदिवराह" उपाधि किस प्रतिहार शासक की थी?
6 कन्नौज को राजधानी किसने बनाया?
7 अरब यात्री सुलेमान ने किस शासक के समय यात्रा की?
8 राजशेखर किस प्रतिहार शासक के गुरु थे?
9 "कुवलयमाला" की रचना किस प्रतिहार शासक के समय हुई?
10 प्रतिहारकालीन मंदिर स्थापत्य शैली कौन-सी है?