राजस्थान के परमार वंश
परमार राजपूत अग्निकुंड से उत्पन्न माने गए चार वंशों में से एक हैं। मालवा के परमार (राजा भोज) सबसे प्रसिद्ध थे, पर राजस्थान में भी इनकी आबू, जालोर, किराडू और वागड़ शाखाओं ने 10वीं से 13वीं सदी तक शासन किया। आबू के परमारों के समय ही विश्व प्रसिद्ध देलवाड़ा जैन मंदिर बने।
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उत्पत्ति
- चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो के अनुसार आबू पर्वत पर वशिष्ठ मुनि के अग्निकुंड से चार वंश उत्पन्न हुए — परमार, प्रतिहार, चौहान व चालुक्य (सोलंकी)।
- "परमार" का अर्थ — शत्रु को मारने वाला। प्रारंभ में ये राष्ट्रकूटों और बाद में प्रतिहारों व गुजरात के सोलंकियों के सामंत रहे।
- सबसे प्रसिद्ध शाखा मालवा (धार) की थी, जिसके शासक राजा भोज थे; राजस्थान में परमारों की आबू, जालोर, किराडू व वागड़ शाखाएं थीं।
आबू के परमार
आबू (चंद्रावती) के परमार
संस्थापक — धूमराज · राजधानी — चंद्रावती
- आबू के परमारों के मूल पुरुष धूमराज माने जाते हैं; राजधानी चंद्रावती (सिरोही) थी।
- धंधुक के समय गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम के मंत्री विमलशाह ने 1031 ई. में देलवाड़ा का विमल वसही जैन मंदिर बनवाया।
- धारावर्ष आबू का सबसे प्रतापी परमार शासक था; 1178 ई. में कासहृद के युद्ध में सोलंकियों के साथ मिलकर मुहम्मद गौरी को पराजित करने में भाग लिया।
- अचलेश्वर (अचलगढ़) में मंदाकिनी कुंड पर धारावर्ष की "एक ही बाण से तीन भैंसों को भेदने" वाली प्रतिमा है।
- धारावर्ष के छोटे भाई प्रह्लादनदेव विद्वान थे — इन्होंने "पार्थ पराक्रम व्यायोग" नाटक लिखा।
- सोमसिंह के समय 1230 ई. में मंत्री वस्तुपाल-तेजपाल ने देलवाड़ा में लूण वसही (नेमिनाथ) मंदिर बनवाया।
- 14वीं सदी के आरंभ में देवड़ा चौहानों (लुंभा) ने आबू पर अधिकार कर परमार शासन समाप्त किया।
आबू के परमारों का क्रम (प्रमुख शासक)
| शासक | प्रमुख घटनाएं |
|---|---|
| धूमराज | आबू के परमारों के मूल पुरुष; वंश की स्थापना |
| धंधुक | गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम से मतभेद होने पर कुछ समय चित्तौड़ में मालवा के राजा भोज के पास शरण ली; बाद में पुनः सामंत बना; इसी के समय विमल वसही (1031) बना |
| यशोधवल | सोलंकी कुमारपाल का सामंत; मालवा के बल्लाल को हराया |
| धारावर्ष | सबसे प्रतापी शासक (लगभग 1163-1219); कासहृद युद्ध (1178) में गौरी की पराजय में भागीदारी; अचलेश्वर की प्रतिमा |
| सोमसिंह | इसके समय लूण वसही (1230) बना; मंदिर के लिए गांव दान में दिया |
| प्रतापसिंह व उत्तराधिकारी | परमार शक्ति का पतन; 14वीं सदी के प्रारंभ में देवड़ा चौहानों ने चंद्रावती व आबू पर अधिकार किया |
देलवाड़ा के जैन मंदिर (माउंट आबू)
परमारकालीन स्थापत्य का सर्वोत्तम उदाहरण · सफेद संगमरमर की बारीक नक्काशी
| मंदिर | निर्माता | वर्ष | समर्पित |
|---|---|---|---|
| विमल वसही | विमलशाह (सोलंकी भीमदेव का मंत्री/दंडपति) | 1031 | प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) |
| लूण वसही | वस्तुपाल-तेजपाल (वाघेला मंत्री) | 1230 | 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ |
- लूण वसही में देवरानी-जेठानी के गोखले (आले) प्रसिद्ध हैं — वस्तुपाल-तेजपाल की पत्नियों द्वारा बनवाए गए।
- इन मंदिरों की छतों व स्तंभों पर संगमरमर की नक्काशी इतनी बारीक है कि कर्नल टॉड ने इसकी अत्यधिक प्रशंसा की।
मालवा के परमार व राजा भोज
- मालवा के परमार वंश की राजधानी पहले उज्जैन और बाद में धार रही; संस्थापक उपेंद्र (कृष्णराज) माने जाते हैं।
- मुंज (वाक्पतिराज द्वितीय) — विद्वानों का संरक्षक; मेवाड़ के आघाट (आहड़) पर आक्रमण किया।
- राजा भोज (लगभग 1010-1055) — परमार वंश का सबसे विद्वान शासक; ग्रंथ "समरांगण सूत्रधार" (वास्तुशास्त्र), "सरस्वती कंठाभरण"; धार में भोजशाला (सरस्वती मंदिर)।
- राजा भोज का चित्तौड़ पर कुछ समय अधिकार रहा; उन्होंने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण (समिद्धेश्वर) मंदिर बनवाया।
- वागड़ (डूंगरपुर-बांसवाड़ा) के परमार मालवा के परमारों की ही शाखा थे।
अन्य शाखाएं
| शाखा | क्षेत्र / राजधानी | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| जालोर के परमार | जालोर | जालोर दुर्ग (सुवर्णगिरि) का प्रारंभिक निर्माण; 12वीं सदी में कीर्तिपाल चौहान ने जालोर जीता |
| किराडू के परमार | किराडू (बाड़मेर) | किराडू शिलालेख (1161) से वंशावली; किराडू के मंदिर "राजस्थान का खजुराहो" |
| वागड़ के परमार | अर्थूणा (बांसवाड़ा) | मालवा के परमारों की शाखा; चामुंडराज ने अर्थूणा में मंडलेश्वर शिव मंदिर बनवाया |
| मालवा के परमार | धार / उज्जैन | राजा भोज ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण (समिद्धेश्वर) मंदिर बनवाया |
🛕 किराडू के मंदिर
बाड़मेर; सोमेश्वर (शिव) मंदिर सबसे प्रसिद्ध; मैथुन मूर्तियों व उत्कृष्ट शिल्प के कारण "राजस्थान का खजुराहो"; सोलंकी-परमार काल (11वीं-12वीं सदी)।
🏯 चंद्रावती
आबू रोड के पास आबू के परमारों की राजधानी; आज केवल खंडहर — मंदिरों व मूर्तियों के अवशेष।
🌿 अर्थूणा के मंदिर
बांसवाड़ा; मंडलेश्वर शिव मंदिर (1080) सहित शिव, विष्णु व जैन मंदिरों का समूह।
📝 ध्यान दें: चित्तौड़ का समिद्धेश्वर मंदिर राजा भोज ने बनवाया था और बाद में महाराणा मोकल ने इसका जीर्णोद्धार कराया, इसलिए इसे "मोकलजी का मंदिर" भी कहते हैं।
⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) आबू के परमारों की राजधानी — चंद्रावती; वागड़ के — अर्थूणा। (2) विमल वसही — आदिनाथ (1031); लूण वसही — नेमिनाथ (1230)। (3) समिद्धेश्वर मंदिर — राजा भोज ने बनवाया, मोकल ने जीर्णोद्धार कराया।
वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)
- अग्निकुंड से उत्पत्ति का उल्लेख — पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई)।
- आबू के परमारों के मूल पुरुष — धूमराज; राजधानी — चंद्रावती।
- विमल वसही (1031) — विमलशाह, धंधुक के समय।
- सबसे प्रतापी शासक — धारावर्ष; कासहृद युद्ध — 1178।
- "पार्थ पराक्रम व्यायोग" — प्रह्लादनदेव।
- लूण वसही (1230) — वस्तुपाल-तेजपाल।
- "राजस्थान का खजुराहो" — किराडू (बाड़मेर); किराडू शिलालेख — 1161।
- वागड़ के परमारों की राजधानी — अर्थूणा (बांसवाड़ा); मंडलेश्वर मंदिर — चामुंडराज।
- चित्तौड़ का समिद्धेश्वर मंदिर — राजा भोज; जीर्णोद्धार — मोकल।
- धंधुक ने शरण ली — राजा भोज (चित्तौड़) के पास।
- विमल वसही — आदिनाथ; लूण वसही — नेमिनाथ।
- देवरानी-जेठानी के गोखले — लूण वसही।
- "समरांगण सूत्रधार" — राजा भोज; भोजशाला — धार।
- किराडू का प्रसिद्ध मंदिर — सोमेश्वर; अर्थूणा — मंडलेश्वर (1080)।
- आबू पर परमार शासन का अंत — देवड़ा चौहान (14वीं सदी)।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
विकल्प चुनें — सही उत्तर तुरंत दिखेगा।
1 अग्निकुंड से चार राजपूत वंशों की उत्पत्ति का उल्लेख किस ग्रंथ में है?
2 आबू के परमारों की राजधानी कौन-सी थी?
3 आबू के परमारों के मूल पुरुष कौन माने जाते हैं?
4 आबू का सबसे प्रतापी परमार शासक कौन था?
5 "पार्थ पराक्रम व्यायोग" के रचयिता कौन हैं?
6 देलवाड़ा का विमल वसही मंदिर किसने बनवाया?
7 लूण वसही मंदिर किसने बनवाया?
8 "राजस्थान का खजुराहो" किसे कहा जाता है?
9 वागड़ के परमारों की राजधानी कौन-सी थी?
10 चित्तौड़ के समिद्धेश्वर मंदिर का निर्माण किसने करवाया?
11 देलवाड़ा का विमल वसही मंदिर किस तीर्थंकर को समर्पित है?
12 देवरानी-जेठानी के गोखले किस मंदिर में हैं?
13 "समरांगण सूत्रधार" के रचयिता कौन हैं?
14 सोलंकी भीमदेव से मतभेद के बाद धंधुक ने किसके पास शरण ली?
15 आबू पर परमारों के बाद किसका अधिकार हुआ?