राजस्थान में 1857 की क्रांति
1857 में जब देश भर में अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह भड़का, तब राजस्थान (राजपूताना) में भी सैनिक छावनियों और कई ठिकानों में विद्रोह हुआ। अधिकांश राजा अंग्रेज़ों के साथ रहे, परंतु आऊवा, कोटा और सलूंबर जैसे क्षेत्रों में जनता और सामंतों ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया।
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पृष्ठभूमि
- 1817-18 में अधिकांश रियासतों ने अंग्रेज़ों से संधियां कर लीं, जिससे वे आंतरिक मामलों में भी हस्तक्षेप करने लगे।
- 1857 के समय राजपूताना के A.G.G. (एजेंट टू गवर्नर जनरल) — जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे; मुख्यालय माउंट आबू।
- राजपूताने में लगभग 5000 भारतीय सैनिक थे, पर अंग्रेज़ सैनिक नहीं थे।
- मेरठ (10 मई 1857) के विद्रोह की खबर मिलने पर राजस्थान की छावनियों में असंतोष फैल गया।
राजस्थान की 6 सैनिक छावनियां
| छावनी | स्थान | विद्रोह की तिथि | विशेष |
|---|---|---|---|
| नसीराबाद | अजमेर | 28 मई 1857 | राजस्थान में सबसे पहले विद्रोह; 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री; सैनिक दिल्ली की ओर गए |
| नीमच | मध्य प्रदेश | 3 जून 1857 | सैनिक देवली की ओर बढ़े; हीरासिंह व मोहम्मद अली बेग |
| देवली | टोंक | जून 1857 | नीमच के विद्रोही सैनिकों ने छावनी लूटी |
| एरिनपुरा | पाली (जोधपुर लीजन) | 21 अगस्त 1857 | "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी" का नारा; विद्रोही आऊवा पहुंचे |
| ब्यावर | ब्यावर | — | विद्रोह नहीं हुआ |
| खेरवाड़ा | उदयपुर | — | विद्रोह नहीं हुआ (मेवाड़ भील कोर) |
आऊवा का संघर्ष
ठाकुर कुशालसिंह चांपावत
आऊवा (पाली) · राजस्थान में 1857 का सबसे प्रमुख नायक
- एरिनपुरा के विद्रोही सैनिकों ने आऊवा पहुंचकर कुशालसिंह का नेतृत्व स्वीकार किया; आसोप, गूलर, आलणियावास आदि ठिकानों के सामंत भी साथ आए।
- बिथौड़ा युद्ध में जोधपुर की सेना (ओनाड़सिंह पंवार) और लेफ्टिनेंट हीथकोट पराजित हुए।
- चेलावास युद्ध में A.G.G. लॉरेंस की सेना पराजित हुई और जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेसन मारा गया; उसका सिर आऊवा के किले के द्वार पर लटका दिया गया। इसे "काले-गोरों का युद्ध" भी कहा जाता है।
- आऊवा की सुगाली माता (10 सिर, 54 हाथ वाली प्रतिमा) को "1857 की क्रांति की देवी" कहा जाता है; अंग्रेज़ इसे अजमेर ले गए, अब यह पाली के बांगड़ संग्रहालय में है।
- 1860 में कुशालसिंह ने नीमच में आत्मसमर्पण किया; जांच आयोग ने उन्हें बरी कर दिया।
कोटा में विद्रोह
कोटा का विद्रोह
15 अक्टूबर 1857 · राजस्थान में सबसे संगठित व लंबा विद्रोह
- नेतृत्व — लाला जयदयाल (वकील) और मेहराब खां (रिसालदार)।
- कोटा के पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन व उसके दो पुत्रों की हत्या कर दी गई।
- लगभग 6 महीने तक कोटा विद्रोहियों के नियंत्रण में रहा; महाराव रामसिंह द्वितीय महल में नज़रबंद रहे।
- मार्च 1858 में जनरल रॉबर्ट्स ने कोटा पर पुनः अधिकार किया; जयदयाल और मेहराब खां को फांसी दी गई।
अन्य प्रमुख केंद्र व व्यक्तित्व
🏃 तात्या टोपे
1857-59 के बीच कई बार राजस्थान आए (भीलवाड़ा, टोंक, झालावाड़, बांसवाड़ा, सीकर आदि)। नरवर के मानसिंह के विश्वासघात से पकड़े गए और 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी (सिप्री) में फांसी दी गई।
🎖️ अमरचंद बांठिया
बीकानेर मूल के ग्वालियर के व्यापारी; क्रांतिकारियों को आर्थिक सहायता दी; राजस्थान के प्रथम शहीद (ग्वालियर में फांसी)। "1857 की क्रांति के भामाशाह"।
🏰 सलूंबर (मेवाड़)
सलूंबर के रावत केसरीसिंह व कोठारिया के रावत जोधसिंह ने क्रांतिकारियों को शरण दी; तात्या टोपे की सहायता की।
🕌 टोंक
नवाब वज़ीरुद्दौला अंग्रेज़ों के समर्थक थे, परंतु सेना व जनता (मीर आलम खां) ने विद्रोह किया।
🐫 बीकानेर
महाराजा सरदारसिंह राजस्थान के एकमात्र शासक थे जो स्वयं सेना लेकर राज्य से बाहर (हरियाणा के बाडलू) अंग्रेज़ों की सहायता को गए।
👑 जयपुर
महाराजा रामसिंह द्वितीय ने अंग्रेज़ों का साथ दिया; बदले में "सितार-ए-हिंद" की उपाधि व कोटकासिम परगना मिला।
1857 और राजस्थानी साहित्य
- सूर्यमल्ल मिश्रण (बूंदी) — "वीर सतसई" में अंग्रेज़ों के पक्षधर राजाओं की आलोचना और वीरों को प्रेरणा।
- चारण कवि शंकरदान सामौर ने अपनी कविताओं में अंग्रेज़ों का विरोध किया।
- आऊवा के संघर्ष पर लोकगीत — "ढोल बाजे, थाली बाजे, भेलो बाजे बांकियो; अजंट ने मारने दरवाजे नाखियो, जूझे आऊवो"।
क्रांति के परिणाम
- क्रांति असफल रही — कारण: शासकों का अंग्रेज़ों को समर्थन, केंद्रीय नेतृत्व व एक योजना का अभाव, सीमित जनसहभागिता।
- 1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा — भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश क्राउन के पास गया; रियासतों के विलय की नीति समाप्त हुई।
- अंग्रेज़ों ने राजाओं को अपना सहयोगी बनाया, जबकि सामंतों की शक्ति घटाई गई।
- राजस्थान में आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना और प्रजामंडल आंदोलनों की नींव पड़ी।
⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) राजस्थान में क्रांति का प्रारंभ — नसीराबाद (28 मई 1857)। (2) आउवा — ठाकुर कुशालसिंह चंपावत; सुगाली माता — “1857 की क्रांति की देवी”। (3) कोटा में मेजर बर्टन की हत्या — लाला जयदयाल व मेहराब खां के नेतृत्व में।
वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)
- 1857 में A.G.G. — जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस।
- राजस्थान में प्रथम विद्रोह — नसीराबाद, 28 मई 1857।
- विद्रोह न होने वाली छावनियां — ब्यावर व खेरवाड़ा।
- एरिनपुरा विद्रोह — 21 अगस्त 1857; नारा "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी"।
- आऊवा — ठाकुर कुशालसिंह चांपावत; बिथौड़ा (8 सितंबर), चेलावास (18 सितंबर)।
- चेलावास में मारा गया — मॉक मेसन; "काले-गोरों का युद्ध"।
- "1857 की क्रांति की देवी" — सुगाली माता (आऊवा)।
- कोटा विद्रोह — 15 अक्टूबर 1857, जयदयाल-मेहराब खां; मेजर बर्टन की हत्या।
- राजस्थान के प्रथम शहीद — अमरचंद बांठिया।
- तात्या टोपे को फांसी — 18 अप्रैल 1859, शिवपुरी।
- राज्य से बाहर जाकर अंग्रेज़ों की मदद करने वाला शासक — बीकानेर के सरदारसिंह।
- राजस्थान की 6 सैनिक छावनियां — नसीराबाद, नीमच, देवली, ब्यावर, एरिनपुरा, खैरवाड़ा।
- एरिनपुरा के सैनिकों का नारा — “चलो दिल्ली, मारो फिरंगी”।
- तत्कालीन AGG — जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस।
- तात्या टोपे पकड़े गए — नरवर (1859)।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
विकल्प चुनें — सही उत्तर तुरंत दिखेगा।
1 राजस्थान में 1857 का विद्रोह सबसे पहले किस छावनी में हुआ?
2 1857 के समय राजपूताना के A.G.G. कौन थे?
3 आऊवा के ठाकुर कुशालसिंह किस शाखा के थे?
4 चेलावास युद्ध में कौन अंग्रेज़ अधिकारी मारा गया?
5 "1857 की क्रांति की देवी" किसे कहा जाता है?
6 कोटा में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
7 राजस्थान के प्रथम शहीद कौन माने जाते हैं?
8 किन छावनियों में 1857 में विद्रोह नहीं हुआ?
9 "वीर सतसई" के रचयिता कौन हैं?
10 तात्या टोपे को कहां फांसी दी गई?